Monday, January 18, 2016

कहानी – 2

बैठे थे यूँ ही एक दिन
तो एक कहानी याद आई
कुछ पसंद कुछ न पसंद
पर हर दम वो कहानी फिर साथ आई

कहता रहता था वो अटपटी बातें
देता था पर सब को वो मुस्कराहट भरी यादें
वो मुस्कुराता भी बहुत था
दूसरों को हसाता भी बहुत था

ज़िन्दगी की दौड़ में आगे जब चला वो
तो गुम हो गया वो
क़ैद हुआ अँधेरे में कहीं
थोड़ी देर के लिए तो मानो,
सुन्न हो गया वो

दूर कहीं उसे रौशनी दिखती रहती
वो उस ओर दौड़ा जाता
पर वो दूरी उतनी ही रहती
मुह उस ताराफ मोड़, थक कर फिर बैठ जाता

रोज़ कोशिश करता रहता
दीवारों से लड़ता रहता
हिम्मत टूटी इस कदर की
आँखें खुली सो जाया करता

अँधेरे में ही फिर संभल गया वो
सन्नाटे में रुल गया वो
अब रौशनी की वो झलक भी बंद हो गयी
रात – ऐ – ला.मेह्दूद# में ढल गया वो       #रात – ऐ – ला.मेह्दूद => infinite night

कुछ रोज़ बाद जब रौशनी पड़ी तन पे
तो गुस्सा कर झल्ला पड़ा वो
अँधेरे की लत इस कदर थी मन में
भाग कर फिर अँधेरे की ओर मुद चला वो

आदत तो पड़ी उस काले रंग की
पर खुश वो कभी न था
निकले कैसे अब इस ढंग से
मन को होश भी तो न था

मायूसी के इस दौर में उसे एक सपना दिखा
दिन के उजाले में किसी का हसना दिखा.

इस बार जब आँखें खोली उसने,
गुस्सा और जूनून एक साथ भरा मन में
खड़ा नहीं हो सका, तो रेंगता चला
वक़्त लगा, पर आखिर कार वो बाहर निकला

रौशनी कुछ दिन तो काटने को दौड़ी
पर फिर अपनी सी लगने लगी
ज़िन्दगी फिर जो वापस आई थोड़ी थोड़ी
तब हर आँच सुहानी लगने लगी

अँधेरे से निकल आया वो
कभी न भूला ज़िन्दगी ने सबक सिखाया जो.
जो है उसी में ख़ुशी ढूँढी उसने
और हस्ते मुस्कुराते ज़िन्दगी फिरी ढूँढी उसने



Don’t look happiness where other people find it. You are not other people. Look what really makes you happy, and Go For it.

कहानी

बैठे थे यूँ ही एक दिन
तो एक कहानी याद आई
कुछ पसंद कुछ न पसंद
पर हर दम वो कहानी फिर साथ आई

दरख़्त को काटने जा रहा था एक आदमी
कहता की डाल तो ठीक है ,
पर ये दरख़्त सोने नहीं देती
कठफोड़वा# चोट जब मारे इस पर         [#कठफोड़वा = woodpecker]
आँख लगे भी अगर,
वो आवाज़ कमबख्त आँख लगने नहीं देती

पागल था न समझ था वो बेचारा
वैसे क़सूर पूरा नहीं था उसका
नींद के बोझ का था जो मारा
लोगों ने समझाया बुझाया तो समझ गया वो
आरी फ़ेंक कर फ़िर सो गया वो

मगर सहर से पहले वो कठफोड़वा फिर आया
फिर नींद से उसे उठाया
और इस बार वो खुद न रोक पाया
गुस्से में उठाई आरी उसने,
और पेड़ को काटता चला गया

सुबह लोगों ने देखा और अफ़सोस जताया
की वो अपने गुस्से को न रोक पाया
अब क्या दरख़्त और क्या डाली बची है
ज़मीन से लिपट कर सारी की सारी बिछी है

फिर कठफोड़वा तो नहीं आया
मगर धुप आई, बारिश आई
हाँ, नींद अभी भी नहीं आई

काश वो देखता
की पेड़ कितना कुछ कर देता था
नीद पूरी न हो भले ही
पर क्या छाओं और क्या वो हरयाली देता था

पर सब बिखर गया
गुस्सा जब उसके सर आया
खुशियों की क़दर भुला दी उसने
सिमट ले गया उसे एक अँधेरा साया

तुम लोग इस साए से संभालना
ऐहसास-ऐ-ख़ुशी को समझना
ग़मों को याद करना आसान लगेगा
यारों कुछ चीज़ मुश्किल भी तो कभी करना!


Never Take Extreme measures when you are angry. You will regret it, ALWAYS!

कोशिश

दुआएँ मांगते हैं लोग
ज़िद की जगह
गुज़ारीश करते हैं फिर
कोशिश की जगह

चले दो कदम भी अगर
मीलों का एहसास करते हैं
ख्वाहिश करें भी अगर
मेहनत के क़रीब से चल गुज़रते हैं

करो कभी मेहनत
साज़िश की जगह
उठाओ कभी ज़ेह्मेत
एक कशिश की तरह

ज़ेहन में कुछ ख़ास है
तो बेफ़िक्र आगे बढ़ो
कोशिश में ही तो आस है
दुनिया से ही चाहे लड़ो

ईमान से बढाओ क़दम
तो मंजिल को क़रीब पाओगे
महेत-ऐ-ख्व़ाब पर नज़र रखो हर दम

तो जहान को कदमों में पाओगे

Monday, December 7, 2015

मोहारिक़

अलफ़ाज़ जो ज़हन में हैं
इरादे जो दिल में हैं
खुदी से आगे बढ़ कर
ज़िन्दगी एक मंज़िल में है

दिखता नही किसी को
सब को दिखती वो कमी है
कैसे समझाएं कि
आसमान से तो पहाड़ भी दिखती जैसे ज़मीन है

सबने देखा जो बंजर
पौधे जो मैंने लगाए
कुछ रोज़ की बारिश जब हुई
तब सबने देखे उस पेड़ के साए

इक डोर से बाँध ज़माने ने रखा
दौड़ कर पकड़ने की कोशिश जो की
दौड़ा फिर भी क्यूंकि मझे जो दिखा
उसने किसी ने समझने की कोशिश भी नही की

कई बरस बीते इम्तेहान में
आख़िर में सब लगा एक तारीख़ की तरह
जिन्होंने भी पत्थर फेकें थे तब
उन सब ने माना मुझे एक मोहारिक़# की तरह




#मोहारिक़  -> initiator: one who puts things into action

Wednesday, May 13, 2015

ख्व़ाब

ख्व़ाब देखे थे बचपन में
घूमते भटकते नदियों पहाड़ों के आँगन में
अब तो बस नींद की फ़िक्र है
ख़्वाब का तो बस इस शायरी में ज़िक्र है


तब तो माहौल कुछ यूँ था
की ख्व़ाब का तो मानो जुनूं था
मानो मौला की गोद में सर रख कर सोते
क्या तो यारों वो सुकूं था


अब आलम कुछ ऐसा है
एक सूखे दरख़्त जैसा है
सुबह की आंच जब लगती है
न हरयाली दिखती न छाँव दिखती है


कभी मशहूर से दिखते थे
तो कभी फ़रिश्ते से दिखते थे
और जो ना सच हो पाया वो ख्व़ाब,
तो मायूस नहीं होते थे
अगली रात एक नया ख्व़ाब देख लेते थे


अब वक़्त कुछ बदल सा गया है
ख़्वाबों का दौर कुछ गुज़र सा गया है
बचपन की यादें कभी कभी आहट करती है
तो हाँ ज़रूर चेहरे पे एक मुस्कराहट आती है


बड़े होने के ख्व़ाब भी तो देखे थे
सोच में तो वो सुहाने और भी लगे थे
अब उन ख़्वाबों पे हसी आती है
क्यूंकि अब तो सिर्फ हक़ीक़त नज़र आती है


गुज़रे वो दिन दोबारा जीने को जी करता है
ख्वाब-ऐ-बरक़त दुबारा देखने को जी करता है
मग़र ज़ेहन पर अब भी भारी वो फ़िक्र है
और ख्व़ाब का तो यारों सिर्फ इस शायरी में ज़िक्र है

Sunday, October 19, 2014

सोचो ज़रा

दिल की ही बातों से लिखी जाती तो
कैसी होती ये दुनिया
मन की ही आँखों से पढ़ी जाती तो
कैसी होती ये दुनिया
सोचो ज़रा

इक उम्र साथ गुज़ारने की ख्वाहिश जो होती
और जो उन इरादों की पकड़ न पाती ये दुनिया
जो चाहें वो राह खुल जाती
और जो रोक न पाती ये दुनिया
सोचो ज़रा

खुले आसमां तले तमन्नाएं उड़ान जो भरतीं
और आँखें खुली देखती रेहती ये दुनिया
मंजिलों के पार ज़िद पकड़ कर ज़िन्दगी जो चलती
तो पीछे पीछे भागती ये दुनिया
सोचो ज़रा

ज़मीं से लिपट कर जो बिखरती गर
तो चुन चुन कर पिरोती ये दुनिया
जिनके सहारे ज़िन्दगी फिर खडी होती
कैसा होता जो ऐसे फरिश्तों से भरी होती ये दुनिया
सोचो ज़रा

तेहज़ीब–ऐ–फ़ितरत से मुलाक़ात जो करती
हए दिल को छू जाती ये दुनिया
किसी के ख़ुदी की इज्ज़त जो करती
तो यार अपनी एह्मियत ज़ाहिर कर जाती ये दुनिया
सोचो ज़रा

दिल की ही बातों से लिखी जाती तो
कैसी होती ये दुनिया
मन की ही आँखों से पढ़ी जाती तो
कैसी होती ये दुनिया

सोचो ज़रा

Thursday, January 2, 2014

आगे बढ़ चलो यारों

कुछ पाया कुछ खोया
कुछ बिखरा कुछ पिरोया
मगर न एहसास–ऐ–ख़ुशी और न इम्तेहान-ऐ-ग़म से रुको यारों
आगे बढ़ चलो यारों

बीते वक़्त का वो सफ़र सुहाना
ज़िन्दगी चली हो जैसे कोई अफसाना
वो सफ़र अब ख़त्म हो चला; अब कहीं और घूमो यारों
आगे बढ़ चलो यारों

कोई सुबह हुई पर रौशनी नहीं थी
ज़िन्दगी लगने वीरानी लगी थी
होगी सेहर रौनक भरी; थोडा इंतज़ार करो यारों
आगे बढ़ चलो यारों

सपने को हकीक़त में बदलने चले थे
कोशिश की दिल से मगर बिखरने लगे थे
नए सपनों से भर जाएंगी रातें; तबियत से एक नींद तो लो यारों
आगे बढ़ चलो यारों

ज़िन्दगी कुछ नया लायी तुम्हारे लिए ही
नयी राहें खुली तुम्हारे लिए ही
खुद पर यकीन रख कर उस राह को पकड़ो यारों
आगे बढ़ चलो यारों

आएंगी दिल में वो यादें बीती
उठेंगी मन में वो बातें बीती
कहना उन यादों से तुम; की अब तुम भी बढ़ो यारों
आगे बढ़ चलो यारों

कुछ पाया कुछ खोया
कुछ बिखरा कुछ पिरोया
मगर न एहसास–ऐ–ख़ुशी और न इम्तेहान-ऐ-ग़म से रुको यारों

आगे बढ़ चलो यारों