ख्व़ाब देखे थे बचपन में
घूमते भटकते नदियों पहाड़ों के आँगन में
अब तो बस नींद की फ़िक्र है
ख़्वाब का तो बस इस शायरी में ज़िक्र है
तब तो माहौल कुछ यूँ था
की ख्व़ाब का तो मानो जुनूं था
मानो मौला की गोद में सर रख कर सोते
क्या तो यारों वो सुकूं था
अब आलम कुछ ऐसा है
एक सूखे दरख़्त जैसा है
सुबह की आंच जब लगती है
न हरयाली दिखती न छाँव दिखती है
कभी मशहूर से दिखते थे
तो कभी फ़रिश्ते से दिखते थे
और जो ना सच हो पाया वो ख्व़ाब,
तो मायूस नहीं होते थे
अगली रात एक नया ख्व़ाब देख लेते थे
अब वक़्त कुछ बदल सा गया है
ख़्वाबों का दौर कुछ गुज़र सा गया है
बचपन की यादें कभी कभी आहट करती है
तो हाँ ज़रूर चेहरे पे एक मुस्कराहट आती है
बड़े होने के ख्व़ाब भी तो देखे थे
सोच में तो वो सुहाने और भी लगे थे
अब उन ख़्वाबों पे हसी आती है
क्यूंकि अब तो सिर्फ हक़ीक़त नज़र आती है
गुज़रे वो दिन दोबारा जीने को जी करता है
ख्वाब-ऐ-बरक़त दुबारा देखने को जी करता है
मग़र ज़ेहन पर अब भी भारी वो फ़िक्र है
और ख्व़ाब का तो यारों सिर्फ इस शायरी में ज़िक्र
है