Wednesday, May 13, 2015

ख्व़ाब

ख्व़ाब देखे थे बचपन में
घूमते भटकते नदियों पहाड़ों के आँगन में
अब तो बस नींद की फ़िक्र है
ख़्वाब का तो बस इस शायरी में ज़िक्र है


तब तो माहौल कुछ यूँ था
की ख्व़ाब का तो मानो जुनूं था
मानो मौला की गोद में सर रख कर सोते
क्या तो यारों वो सुकूं था


अब आलम कुछ ऐसा है
एक सूखे दरख़्त जैसा है
सुबह की आंच जब लगती है
न हरयाली दिखती न छाँव दिखती है


कभी मशहूर से दिखते थे
तो कभी फ़रिश्ते से दिखते थे
और जो ना सच हो पाया वो ख्व़ाब,
तो मायूस नहीं होते थे
अगली रात एक नया ख्व़ाब देख लेते थे


अब वक़्त कुछ बदल सा गया है
ख़्वाबों का दौर कुछ गुज़र सा गया है
बचपन की यादें कभी कभी आहट करती है
तो हाँ ज़रूर चेहरे पे एक मुस्कराहट आती है


बड़े होने के ख्व़ाब भी तो देखे थे
सोच में तो वो सुहाने और भी लगे थे
अब उन ख़्वाबों पे हसी आती है
क्यूंकि अब तो सिर्फ हक़ीक़त नज़र आती है


गुज़रे वो दिन दोबारा जीने को जी करता है
ख्वाब-ऐ-बरक़त दुबारा देखने को जी करता है
मग़र ज़ेहन पर अब भी भारी वो फ़िक्र है
और ख्व़ाब का तो यारों सिर्फ इस शायरी में ज़िक्र है

5 comments:

  1. So true....very well written !!! :)

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  2. Vr beautiful lines.... Everyone can easily connect wid...

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  3. Vr beautiful lines.... Everyone can easily connect wid...

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  4. This comment has been removed by the author.

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  5. Wow awesome rahul singh ur write up is awesome kya kahu alfaaz hi nahi hai yaar too good �������������� U r so talented i didnt know that love it ��

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