Monday, December 7, 2015

मोहारिक़

अलफ़ाज़ जो ज़हन में हैं
इरादे जो दिल में हैं
खुदी से आगे बढ़ कर
ज़िन्दगी एक मंज़िल में है

दिखता नही किसी को
सब को दिखती वो कमी है
कैसे समझाएं कि
आसमान से तो पहाड़ भी दिखती जैसे ज़मीन है

सबने देखा जो बंजर
पौधे जो मैंने लगाए
कुछ रोज़ की बारिश जब हुई
तब सबने देखे उस पेड़ के साए

इक डोर से बाँध ज़माने ने रखा
दौड़ कर पकड़ने की कोशिश जो की
दौड़ा फिर भी क्यूंकि मझे जो दिखा
उसने किसी ने समझने की कोशिश भी नही की

कई बरस बीते इम्तेहान में
आख़िर में सब लगा एक तारीख़ की तरह
जिन्होंने भी पत्थर फेकें थे तब
उन सब ने माना मुझे एक मोहारिक़# की तरह




#मोहारिक़  -> initiator: one who puts things into action

Wednesday, May 13, 2015

ख्व़ाब

ख्व़ाब देखे थे बचपन में
घूमते भटकते नदियों पहाड़ों के आँगन में
अब तो बस नींद की फ़िक्र है
ख़्वाब का तो बस इस शायरी में ज़िक्र है


तब तो माहौल कुछ यूँ था
की ख्व़ाब का तो मानो जुनूं था
मानो मौला की गोद में सर रख कर सोते
क्या तो यारों वो सुकूं था


अब आलम कुछ ऐसा है
एक सूखे दरख़्त जैसा है
सुबह की आंच जब लगती है
न हरयाली दिखती न छाँव दिखती है


कभी मशहूर से दिखते थे
तो कभी फ़रिश्ते से दिखते थे
और जो ना सच हो पाया वो ख्व़ाब,
तो मायूस नहीं होते थे
अगली रात एक नया ख्व़ाब देख लेते थे


अब वक़्त कुछ बदल सा गया है
ख़्वाबों का दौर कुछ गुज़र सा गया है
बचपन की यादें कभी कभी आहट करती है
तो हाँ ज़रूर चेहरे पे एक मुस्कराहट आती है


बड़े होने के ख्व़ाब भी तो देखे थे
सोच में तो वो सुहाने और भी लगे थे
अब उन ख़्वाबों पे हसी आती है
क्यूंकि अब तो सिर्फ हक़ीक़त नज़र आती है


गुज़रे वो दिन दोबारा जीने को जी करता है
ख्वाब-ऐ-बरक़त दुबारा देखने को जी करता है
मग़र ज़ेहन पर अब भी भारी वो फ़िक्र है
और ख्व़ाब का तो यारों सिर्फ इस शायरी में ज़िक्र है