Monday, December 7, 2015

मोहारिक़

अलफ़ाज़ जो ज़हन में हैं
इरादे जो दिल में हैं
खुदी से आगे बढ़ कर
ज़िन्दगी एक मंज़िल में है

दिखता नही किसी को
सब को दिखती वो कमी है
कैसे समझाएं कि
आसमान से तो पहाड़ भी दिखती जैसे ज़मीन है

सबने देखा जो बंजर
पौधे जो मैंने लगाए
कुछ रोज़ की बारिश जब हुई
तब सबने देखे उस पेड़ के साए

इक डोर से बाँध ज़माने ने रखा
दौड़ कर पकड़ने की कोशिश जो की
दौड़ा फिर भी क्यूंकि मझे जो दिखा
उसने किसी ने समझने की कोशिश भी नही की

कई बरस बीते इम्तेहान में
आख़िर में सब लगा एक तारीख़ की तरह
जिन्होंने भी पत्थर फेकें थे तब
उन सब ने माना मुझे एक मोहारिक़# की तरह




#मोहारिक़  -> initiator: one who puts things into action

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