Sunday, October 19, 2014

सोचो ज़रा

दिल की ही बातों से लिखी जाती तो
कैसी होती ये दुनिया
मन की ही आँखों से पढ़ी जाती तो
कैसी होती ये दुनिया
सोचो ज़रा

इक उम्र साथ गुज़ारने की ख्वाहिश जो होती
और जो उन इरादों की पकड़ न पाती ये दुनिया
जो चाहें वो राह खुल जाती
और जो रोक न पाती ये दुनिया
सोचो ज़रा

खुले आसमां तले तमन्नाएं उड़ान जो भरतीं
और आँखें खुली देखती रेहती ये दुनिया
मंजिलों के पार ज़िद पकड़ कर ज़िन्दगी जो चलती
तो पीछे पीछे भागती ये दुनिया
सोचो ज़रा

ज़मीं से लिपट कर जो बिखरती गर
तो चुन चुन कर पिरोती ये दुनिया
जिनके सहारे ज़िन्दगी फिर खडी होती
कैसा होता जो ऐसे फरिश्तों से भरी होती ये दुनिया
सोचो ज़रा

तेहज़ीब–ऐ–फ़ितरत से मुलाक़ात जो करती
हए दिल को छू जाती ये दुनिया
किसी के ख़ुदी की इज्ज़त जो करती
तो यार अपनी एह्मियत ज़ाहिर कर जाती ये दुनिया
सोचो ज़रा

दिल की ही बातों से लिखी जाती तो
कैसी होती ये दुनिया
मन की ही आँखों से पढ़ी जाती तो
कैसी होती ये दुनिया

सोचो ज़रा

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