Monday, January 18, 2016

कहानी

बैठे थे यूँ ही एक दिन
तो एक कहानी याद आई
कुछ पसंद कुछ न पसंद
पर हर दम वो कहानी फिर साथ आई

दरख़्त को काटने जा रहा था एक आदमी
कहता की डाल तो ठीक है ,
पर ये दरख़्त सोने नहीं देती
कठफोड़वा# चोट जब मारे इस पर         [#कठफोड़वा = woodpecker]
आँख लगे भी अगर,
वो आवाज़ कमबख्त आँख लगने नहीं देती

पागल था न समझ था वो बेचारा
वैसे क़सूर पूरा नहीं था उसका
नींद के बोझ का था जो मारा
लोगों ने समझाया बुझाया तो समझ गया वो
आरी फ़ेंक कर फ़िर सो गया वो

मगर सहर से पहले वो कठफोड़वा फिर आया
फिर नींद से उसे उठाया
और इस बार वो खुद न रोक पाया
गुस्से में उठाई आरी उसने,
और पेड़ को काटता चला गया

सुबह लोगों ने देखा और अफ़सोस जताया
की वो अपने गुस्से को न रोक पाया
अब क्या दरख़्त और क्या डाली बची है
ज़मीन से लिपट कर सारी की सारी बिछी है

फिर कठफोड़वा तो नहीं आया
मगर धुप आई, बारिश आई
हाँ, नींद अभी भी नहीं आई

काश वो देखता
की पेड़ कितना कुछ कर देता था
नीद पूरी न हो भले ही
पर क्या छाओं और क्या वो हरयाली देता था

पर सब बिखर गया
गुस्सा जब उसके सर आया
खुशियों की क़दर भुला दी उसने
सिमट ले गया उसे एक अँधेरा साया

तुम लोग इस साए से संभालना
ऐहसास-ऐ-ख़ुशी को समझना
ग़मों को याद करना आसान लगेगा
यारों कुछ चीज़ मुश्किल भी तो कभी करना!


Never Take Extreme measures when you are angry. You will regret it, ALWAYS!

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